October 20, 2026

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मेरठ सौरभ राजपूत हत्याकांड: 19 महीने चला मुकदमा, 22 गवाहों की गवाही और पुलिस की जांच ने मुस्कान-साहिल को फांसी तक पहुंचाया

मेरठ, उत्तर प्रदेश। सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत के फैसले के बाद पुलिस की विवेचना, साक्ष्यों को जुटाने और गवाहों को समय पर पेश करने की भूमिका चर्चा में है। इस मामले का मुकदमा करीब 19 महीने चला। जांच के दौरान पुलिस ने गुमशुदगी की शिकायत से लेकर हत्या की आशंका, आरोपियों की तलाश और वारदात से जुड़ी कड़ियों को जोड़ने तक कई पहलुओं पर काम किया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, मामले की चार्जशीट में दर्ज 22 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया गया। अभियोजन पक्ष ने इन्हीं गवाहों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा।

गुमशुदगी की शिकायत से शुरू हुई जांच

सौरभ राजपूत की गुमशुदगी और उनकी हत्या की आशंका से जुड़ी शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। पुलिस को जब संदिग्धों की तलाश करनी थी, उस समय वे कथित तौर पर फरार थे। इसके बाद पुलिस उनकी गतिविधियों पर नजर बनाए रही। बताया जाता है कि मुस्कान और साहिल के मेरठ लौटने पर पुलिस पहले से सतर्क थी। आरोपियों की तलाश से लेकर उनकी गिरफ्तारी और मामले की विवेचना तक जांच टीम ने घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को इकट्ठा करने पर ध्यान दिया।

मेरठ से मनाली तक जोड़ी गईं वारदात की कड़ियां

इस हत्याकांड में कोई प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाह नहीं होने के कारण पुलिस के सामने घटनाक्रम को साक्ष्यों के आधार पर साबित करने की चुनौती थी। जांच के दौरान वारदात के कथित मकसद, आरोपियों की गतिविधियों और घटना से पहले तथा बाद के घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया गया। मामले से जुड़े विवरण के अनुसार, हत्या के बाद मुस्कान और साहिल मनाली तथा कसोल गए थे। पुलिस ने मेरठ से उनके जाने और वापस लौटने तक की गतिविधियों से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को जांच में शामिल किया।

चाकू, गंडासा, ड्रम और सीमेंट की खरीद भी जांच का हिस्सा

सौरभ राजपूत की हत्या और शव को छिपाने से जुड़े मामले में पुलिस ने कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए चाकू और गंडासे सहित अन्य सामान की खरीद से जुड़ी जानकारी जुटाई। शव को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रम और सीमेंट की खरीद से संबंधित दुकानदारों को भी गवाह बनाया गया। इसके अलावा, नींद की गोलियां हासिल करने के लिए कथित तौर पर पर्चा लिखने वाले डॉक्टर से जुड़ी जानकारी भी जांच का हिस्सा बनी। इन तथ्यों के माध्यम से पुलिस ने वारदात से पहले की तैयारियों और घटना के बाद की गतिविधियों की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया।

22 गवाहों को अदालत में पेश करना रहा अहम

मामले की चार्जशीट में दर्ज 22 गवाहों को एक-एक करके अदालत के सामने पेश किया गया। किसी प्रत्यक्ष चश्मदीद के अभाव में परिस्थितिजन्य साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, खरीद से जुड़े तथ्य और गवाहों के बयान मामले की सुनवाई में महत्वपूर्ण रहे। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने इन साक्ष्यों के जरिए घटनाक्रम को स्थापित करने का प्रयास किया। अदालत ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्ष्यों और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद अपना फैसला सुनाया।

जांच और अभियोजन से जुड़े अधिकारियों की भूमिका

इस मामले की जांच की निगरानी मेरठ के तत्कालीन एसएसपी डॉ. विपिन ताडा कर रहे थे। जांच और अभियोजन से जुड़े लोगों में एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह, विवेचनाधिकारी आरके पचौरी, थाने के पैरोकार दिलशाद अहमद और शिवकुमार सिंह, जिला शासकीय अधिवक्ता (DGC) कृष्ण कुमार चौबे तथा सौरभ राजपूत की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह के नाम शामिल हैं। मामले से जुड़े विवरण में इन अधिकारियों और अधिवक्ताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है।

सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत के फैसले की चर्चा

सौरभ राजपूत हत्याकांड ने मेरठ ही नहीं, बल्कि प्रदेशभर में लोगों का ध्यान खींचा था। मामले की जांच में जुटाए गए साक्ष्यों, गवाहों की गवाही और अदालत में हुई सुनवाई के बाद मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाए जाने की जानकारी सामने आई। यह फैसला मामले की न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है। हालांकि, किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि और सजा का आधार अदालत द्वारा स्वीकार किए गए साक्ष्य तथा लागू कानून होते हैं।

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